श्री कृष्ण भगवत गीता ज्ञान, महाभारत में गीता का उपदेश, Krishna updesh to arjun in Hindi, Krishna Geeta Updesh in Hindi, Krishna Arjun Geeta Updesh in Hindi
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Krishna Updesh in Hindi | श्री कृष्ण उपदेश
अपने ही कामों में अपने आपको पूरी तरह से आत्मार्पित कर दो। जिस काम को तुम उचित समझते हो, उसे खुलकर तो करो, जमकर तो करो। भक्ति हो, साधना हो, सेवा हो, तप हो, तपस्या हो, दोस्ती हो, गृहस्थी हो, प्रेम हो जो भी करो पूरी तन्मयता से करो।
श्रीकृष्ण जीवन चरित की प्रत्येक बात निराली है। उनके जीवन की प्रत्येक घटना हम सबसे जुड़ी हुई लगती है एक आम आदमी के जीवन को आधार बनाकर ही जैसे उन्होंने घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया की हो ऐसा प्रतीत होता है लेकिन इसके उपरान्त भी कुछ घटनाएं ऐसी हैं जो हमारे अन्तर मन को प्रेरित करती हैं।
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भगवत गीता ज्ञान |
सदैव खुश रहो, क्यों व्यर्थ की चिन्ता करते हो। गीता में श्रीकृष्ण ने बार-बार यही तो कहा - क्यों व्यर्थ चिन्ता करते हो? क्यों व्यर्थ में डरते हो? कौन क्या बिगाड़ सकता है?
जो हुअा, वह अच्छा हुअा, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है
तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर अाए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।
खाली हाथ अाए अौर खाली हाथ चले। जो अाज तुम्हारा है, कल अौर किसी का था, परसों किसी अौर का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।
परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, अाकाश से बना है अौर इसी में मिल जायेगा। परन्तु अात्मा स्थिर है - फिर तुम क्या हो?
तुम अपने अापको भगवान के अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।
जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का अानंन्द अनुभव करेगा।
मित्रता कैसी हो? यह तो श्रीकृष्ण से सीखें। जब श्रीकृष्ण ने सुदामा की गरीबी देखी तो उसके बिना मांगे, उसे सबकुछ प्रदान कर दिया। इसलिये मित्रता में कभी ऊंच-नीच का भेद नहीं होना चाहिए।
जिन्दगी में सब रास्ते सीधे नहीं होते हैं। सीधे मार्ग पर चलकर हर बार विजय प्राप्त नहीं की जा सकती है। जब विरोधी भारी हों तो कूट नीति को प्रयोग में लायें। इस जीवन में कूटनीति का अर्थ है
साम, दाम, दण्ड और भेद। श्रीकृष्ण ने यही चारों क्रियाएं सम्पन्न कीं। पहले समझाया, फिर लालच दिया, फिर कौरवों में आपस में भेद डाला, फिर भी नहीं माने तो दण्ड दिया।
श्रीकृष्ण की हर कथा से यही सार मिलता है कि व्यक्ति को दूरदर्शी बनना चाहिए। तात्कालिक लाभ की जगह दूरगामी लक्ष्य रखना चाहिए। उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए।
श्रीकृष्ण ने यह ज्ञान दिया कि हिम्मत की ज्यादा आवश्यकता तो मुसीबत के समय है। सफलता नहीं मिलने पर भी हिम्मत न हारना बुद्धिमानी है। हार का विश्लेतषण करो और आगे बढ़ो। जिसने डर को जीत लिया, वह सबको जीत सकता है।
श्रीकृष्ण को सर्वश्रेष्ठ नीतिकार कहा जाता है। यह सच है कि श्रीकृष्ण की नीति नहीं होती तो पाण्डव युद्ध नहीं जीत सकते और नीति में भी निरन्तर परिवर्तन आवश्यक है। किसी भी प्रतियोगी परीक्षा, व्यापार में सफलता के लिए नीति बनाना आवश्यक है और समय-समय पर अपनी नीति में परिवर्तन (नीति का मूल्यांकन) भी करना चाहिए।
किसी भी संस्था को चलाने का सबसे बड़ा नियम होता है कि अनुशासन में रहो। बिना बात की चिन्ता मत करो। भविष्य की बजाय वर्तमान पर ध्यान दो। यही तो श्रीकृष्ण ने बार-बार समझाया है।
महाभारत के सबसे बड़े योद्धा अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य से ज्ञान प्राप्त किया लेकिन उसके बाद भी अपने अनुभव से कुछ न कुछ नया सीखते रहे। यहां तक की अपने मित्र श्रीकृष्ण से भी निरन्तर निर्देश लेते रहे। हर विद्यार्थी के लिये आवश्यक है कि वह अपने शिक्षक से ज्ञान प्राप्त करे और उसके उपरान्त अपनी गलतियों और असफलताओं से भी निरन्तर सीखता रहे।
मित्र वही होता है जो कठिन से कठिन परिस्थिति में भी आपका साथ दे। मित्रता के लिये कोई शर्त नहीं होती। जीवन में आपके पास ऐसे मित्र होने चाहिए, जो हर मुश्किल परिस्थिति में आपका संबल बनें, आप उनके संबल बनें। श्रीकृष्ण ने भी पाण्डवों के साथ अपनी मित्रता जीवन पर्यन्त निभाई। हर मुश्किल वक्त में पाण्डवों के साथ रहे।
श्रीकृष्ण हर स्थिति में, हर मोर्च पर विचारों के धनी रहे। वह किसी भी बंधी-बंधाई लीक पर नहीं चले। जैसी परिस्थिति थी, उसी के अनुसार उन्होंने अपनी भूमिका बदली और यहां तक की द्वारका के राजा होकर भी धर्म युद्ध महाभारत में अर्जुन के सारथी बन गये। जिससे वे उसे पल-पल गाईड कर सकें।
1. गुस्से पर काबू -
'क्रोध से भ्रम पैदा होता है. भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है. जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है. जब तर्क नष्ट होता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है.'
2. देखने का नजरिया -
'जो ज्ञानी व्यक्ति ज्ञान और कर्म को एक रूप में देखता है, उसी का नजरिया सही है.'
3. मन पर नियंत्रण -
'जो मन को नियंत्रित नहीं करते उनके लिए वह शत्रु के समान कार्य करता है.'
4. खुद का आकलन -
'आत्म-ज्ञान की तलवार से काटकर अपने ह्रदय से अज्ञान के संदेह को अलग कर दो. अनुशासित रहो, उठो.'
5. खुद का निर्माण -
'मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है. जैसा वो विश्वास करता है वैसा वो बन जाता है.'
6. हर काम का फल मिलता है -
'इस जीवन में ना कुछ खोता है ना व्यर्थ होता है.